Friday, 12 June 2020

रोमांटिक फिल्मी गीतों के पुरोधा : शकील बदायूंनी


रोमांटिक फिल्मी गीतों के पुरोधा : शकील बदायूंनी
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 एक मशहूर शायर शकील बदायूंनी का स्मृति दिवस आज है। आज ही के दिन 1970 में शकील बदायूंनी मसऊदी साहब  अपने मधुर फिल्मी गीतों के चाहनेवालों और अपनी शायरी के शौकीनों को दुखी छोड़कर इस दुनिया से दूर चले गए।  

 शकील बदायूनी मसूदी का जन्म स्थान उत्तर प्रदेश का शहर बदायूं है यह एक उर्दू के शायर और साहित्यकार तो थे ही इन्होंने बॉलीवुड में फिल्मी गीतों की रचना करके एक अलग नाम कमाया। उनके कृत्यों को देखें तो वर्ष 1961 में फिल्म चौदहवीं का चांद के गीत "चौदहवीं का चांद हो या आफताब हो" के लिए सर्वश्रेष्ठ गीतकार का फिल्मफेयर पुरस्कार दिया गया और 1962 में फिल्म घराना में गीत "हुस्न वाले तेरा जवाब नहीं" के लिए भी सर्वश्रेष्ठ गीतकार का फिल्मफेयर पुरस्कार दिया गया था। इसी तरह 1963 में फिल्म बीस साल बाद में गीत "कहीं दीप जले कहीं दिल" के लिए फिल्मफेयर के सर्वश्रेष्ठ गीतकार का पुरस्कार दिया गया था। शकील बदायूंनी का लिखा एक गीत "मन तड़पत हरिदर्शन को आज", जो कि बैजू बावरा के लिए लिखा गया था, आज भी भारत की आत्मा का प्रतीक है। इस गीत को नौशाद साहब के संगीत निर्देशन में  गाया था महान गायक मोहम्मद रफी ने। 
फिल्मी  गीतों के जानकार अनुराग भारद्वाज का एक संस्मरण याद आता है जिसमें उन्होंने बताया है कि "चौदहवीं का चांद" का पहला गाना रिकॉर्ड किया जाना था। गुरुदत्त जी बेचैन थे और उनसे भी ज्यादा स्टूडियो के कोने में कुर्सी पर बैठे हुए शकील बदायूंनी। संगीतकार रवि शंकर शर्मा उर्फ रवि दोनों की बेचैनी को बहुत अच्छी तरह से समझ रहे थे। दरअसल 'कागज के फूल' फ्लॉप हो चुकी थी, गुरुदत्त और बर्मन दा की जोड़ी टूट चुकी थी और उधर शकील भी पहली बार नौशाद के प्रभाव से बाहर निकल कर किसी नये संगीतकार से जुड़े थे। शकील साहब ने रवि से पूछा था-- क्यों भाई रवि सब ठीक तो रहेगा? रवि ने कहा था फिकर ना करो शकील भाई बस तुम धीरज रखो। गुरुदत्त ने दोनों की बातचीत को सुना तो घबराकर बंगाली लहजे से बोले--अरे शकील, गीत तो चलेगा ना... और भाई ना चले तो तूं बदायूं चला जा और रोबी तूं दिल्ली चला जा और मैं डूब मरूं ! रवि साहब ने उन्हें ढाढ़स बंधाते हुए हंस कर कहा -- दादा, सब ठीक होगा, आप चिन्ता मत करिए। आज भी फिल्मी गानों के शौकीन याद कर सकते हैं कि इस गीत के बाद शकील साहब का जो डंका बजा उसकी धमक आज भी है। 
यह भी कहा जा सकता है कि शकील बदायूंनी फिल्मी दुनिया के ऐसे गीतकार थे जिनका कोई सानी नहीं। मोहम्मद जमाल सोख्ता कादरी के पुत्र शकील बदायूंनी का जन्म 3 अगस्त 1916 को बदायूं उत्तर प्रदेश में हुआ था। अरबी-फारसी, उर्दू और हिंदी की तालीम उनके पिता ने दिलवाई थी। शायरी का तो उन्हें बचपन से ही शौक था। उनके दूर के एक रिश्तेदार थे जो शायर थे। ...और वह थे शायर जियाउल कादरी बदायूंनी, जो दौर के हालात पर शायरी किया करते थे। इन्हीं के सुझाव से शकील साहब अपनी शायरी का संशोधन किया करते थे। 1936 में अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय में उन्होंने दाखिला लिया था और यूनिवर्सिटी के मुशायरे में शिरकत करने लगे। यूनिवर्सिटी से बी.ए. करने के बाद दिल्ली आए और सप्लाई ऑफिस में नौकरी करने लगे। उन दिनों सामाजिक सरोकार की शायरी हुआ करती थी और उस दौर में शकील बदायूंनी साहब रोमांटिक दौर की शायरी दे रहे थे। उस समय की उनकी चंद लाइनें कितनी प्रभावकारी हैं देखिए जरा-- "मैं शकील दिल का हूं तरजुमा कि मोहब्बतों का हूं रास्ता, मुझे फक्र है कि मेरी शायरी मेरी जिंदगी से जुदा नहीं"। शायरी के जरिए ही अलीगढ़ से शकील साहब तशरीफ लाते हैं तब की बम्बई। उनकी मुलाकात यहां होती है मशहूर फिल्मकार ए. आर. कारदार और महान संगीतकार नौशाद साहब से। फिर तो शकील और नौशाद साहब की जोड़ी ऐसी जमीं जो तब तक फिल्मी दुनिया पर जमीं रही जब तक दोनों का निधन नहीं हो गया, लेकिन उनके गाने,उनके संगीत आज भी हमारे जेहन में मौजूद हैं।
 दोनों के पहली बार मिलने का किस्सा नौशाद साहब ने फरवरी 1978 में, जब मैं फिल्म मैगजीन बायस्कोप में सहायक सम्पादक था और उन्हीं के संगीत निर्देशन में निर्माता रघुनन्दन की बन रही फिल्म "चम्बल की रानी" की रिकॉर्डिंग के दिन उनसे बातचीत कर रहा तो बताया था- "जब पहली पहली बार मुझसे शकील साहब मिले तो मैंने उनसे दो लाइनों में अपनी कविता का मर्म सुनाने को कहा। अब उनका एक्सप्रेशन क्या था देखिए-- "हमदर्द का अफसाना दुनिया को सुना देंगे, हर दिल में मोहब्बत की इक आग लगा देंगे।" इसी गाने को नौशाद साहब ने 1947 की फिल्म "दर्द" में बड़ी ही संजीदगी और काबिलियत से पेश किया था। यह गीत जाहिर करता है उनकी रचनाशीलता का प्रमाण। 

शकील साहब ने एक इंटरव्यू में बताया था कि अपने चाचा जिया उल कादरी साहब से शायरी की सलाह लिया करते थे और 1930 में चौदह साल की उम्र में पहली गजल कही। शकील साहब ने बम्बई आने की बात पर उसी साक्षात्कार में कहा था कि मैं फिल्म लाइन में आना नहीं चाहता था, क्योंकि दिल्ली में सरकारी मुलाजिम था लेकिन एक दोस्त के कहने पर बम्बई के एक मुशायरे में शिरकत की, जहां कुछ फिल्म के निर्माता निर्देशकों ने मेरी शायरी सुनी और फिल्मों में लिखने की सलाह दी।... तो मैंने सोचा कि जिंदगी के लिए कुछ काम तो करना ही है। फिर सबकी मानकर फिल्म लाइन में पहुंच गया कि यहाँ अपने मिजाज का माहौल मिल जाएगा। इसलिए मैं सरकारी नौकरी छोड़कर मुंबई आ गया और फिल्म लाइन में शामिल हो गया और पहली फिल्म दर्द के लिए पहला गाना लिखा जिसका संगीत नौशाद साहब ने दिया था। जब शकील साहब से पूछा गया अदब में लिखना और फिल्म के लिए लिखना दोनों में क्या अंतर है तब उनका जवाब था कि अदब में लिखना फ्री होता है। अपने दिमाग की चीज होती है। उसमें पाबंदियां नहीं होतीं और वह एक स्वतंत्र रचना निकलती है, लेकिन फिल्म लाइन में तमाम पाबन्दियां होती हैं। इसी बात को शकील साहब ने विविध भारती रेडियो के एक साक्षात्कार में समझाते हुए कहा था कि-- नंबर एक तो फिल्म के लिए गीत लिखने में हमें कई चीजों पर ध्यान देना पड़ता है। मसलन कलाकार कैसा है, उस समय की सिचुएशन कैसी है, जिस दृश्य में यह गीत लगाया जाएगा उसकी पृष्ठभूमि क्या होगी। इन सबका ध्यान देना पड़ता है। यानी कि कैरेक्टर यदि गमगीन है तो हमें उस कैरेक्टर के गम को महसूस करते हुए अपनी शायरी को अंजाम देना पड़ता है। यदि कैरेक्टर खुश है तो उसकी खुशी का इजहार करते हुए हमें शायरी करनी पड़ती है और नंबर दो -हमें यह भी ख्याल करना पड़ता है कि शायरी की जबान सहज व सरल हो जिसे सब समझ सकें और नंबर 3- की बात है कि हमारी फिल्मों में आमतौर पर सिचुएशन ऐसी होती है कि अधिकांश शायरों को फिल्मों में एक ही तरह के गीत लिखने की गुंजाइश दी जाती है, लेकिन हमें इस बात का ख्याल रखना पड़ता है कि हमारा कलाम सरल व सबकी समझ में आ जाए। उनका कहना यह भी था कि फिल्मों में तर्ज(लिरिक) पर गीत लिखने की भी डिमांड होती है और ऐसे में संगीत की दुनिया में लिखने वालों को तरह-तरह की वैरायटी मिलती है। उन्होंने शायर बनने के लिए क्या-क्या जरूरत होती है, पूछने पर कहा था- "शायर पैदाइशी होता है। शायरी किसी के सिखाने से नहीं आती लेकिन शायद अगर थोड़ी बहुत सलाहियत रखता है और उसको माहौल भी ऐसा ही मिल जाता है तो शायरी का पौधा आगे चलकर बहुत ही फलता-फूलता है। 
यहां यह भी बताना जरूरी है कि शकील साहब की बहुत सी गैर फिल्मी गजलें हैं जिन्हें बेगम अख्तर ने अपनी आवाज दी है और बाद में पंकज उदास साहब ने भी गाया है। उनका फिल्मी सफर बहुत ही सुहाना व सफल रहा कि उन्होंने  जिन 89 फिल्मों में गीत लिखे वे सभी आज मानक ही नहीं बने बल्कि अपने बाद के फिल्मी गीतकारों के लिए एक रास्ता बना गए... आज उनकी पुण्यतिथि पर जितनी भी श्रद्धांजलि दी जाए, कम ही होगी।                           ■ हेमन्त शुक्ल

बाक्स मैटर
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शकील बदायूंनी के मशहूर गीत :
 दिलवाले दिलवाले जल जल के ही मर जाना-- उमादेवी/ नाटक, संग संग रहेंगे तुम्हारे ए हुजूर चंदा से चकोर रहे भला कैसे दूर-- रफी आशा/ मुलजिम, दो हंसों का जोड़ा बिछड़ गयो रे गजब भयो रामा जुलम भयो रे-- लता गंगा जमुना, तू मेरा चांद मैं तेरी चांदनी--श्याम कुमार नूरजहां/दिल्लगी, दुख भरे दिन बीते रे भैया अब सुख भरा दिन आयो रे--शमशाद साथी/ मदर इंडिया, शाकिया आज मुझे नींद नहीं आएगी सुना है तेरी महफिल में रतजगा है-- आशा सखियां/ साहब बीवी ,और गुलाम, एक मीठी नजर फूल बरसा गई मेरी दुनिया में जैसे बाहर आ गई-- रफ़ी आशा / बेटी, मेरे सीने पर जरा हाथ रख कर तो देखो यह दिल की धड़कन नहीं प्यार की शहनाई है-- तलत वांटेड,  राह में चलते चलते नैना मार गई रे-- लता रफी/ राम और श्याम, जबसे तुम्हें देखा है आंखों में तुम ही तुम हो--आशा रफी / घराना, मिलते ही आंखें दिल हुआ दीवाना किसी का अफसाना मेरा बन गया अफसाना किसी का-- तलत शमशाद /बाबुल, जोगन बन जाऊंगी सैंया तोरे कारन-- लता/ शवाब, लगन मेरे मन की बलम नहीं जाने--लता/ बाबुल, आज मेरे मन में सखी बांसुरी बजाए गाए सखी कोई छैलवा हो--लता साथी/ ऑन, ना मैं भगवान हूं ना मैं शैतान हूं दुनिया जो चाहे समझे मैं तो इंसान हूं-- रफी/ मदर इंडिया, इंसाफ की डगर पर बच्चों दिखाओ चल के यह देश है तुम्हारा नेता तुम्हीं हो कल के-- हेमंत कुमार साथी/ गंगा-जमुना, दिल लगाकर हम ये समझे जिंदगी क्या चीज है-- महेंद्र कपूर/ जिंदगी और मौत, मैं भंवरा तू है फूल ए दिल मत भूल जवानी लौट के आए ना--शमशाद मुकेश/मेला, कदर मोरे मन की बलम नहीं जाने--लता/ बाबुल, तेरे सदके बलम न करे कोई गम यह शमा यह जहां फिर कहां--लता/अमर, तेरा ख्याल दिल से भुलाया न जाएगा-- सुरैया/ दिल्लगी, अफसाना लिख रही हूं दिले बेकरार का --उमा देवी/ दर्द, आई है बहारें मिटे जुल्मो सितम--रफी साथी/राम और श्याम, एक बार जरा फिर कह दो मुझे शरमा के तुम दीवाना-- हेमंत कुमार/ बिन बादल बरसात, तू मेरा चांद मैं तेरी चांदनी--सुरैया/दिल्लगी, मान मेरा एहसान अरे नादान कि मैंने तुमसे किया है प्यार--रफी /आन, मधुबन में राधिका नाचे रे--रफी/ कोहिनूर, तेरे सदके बलम न करे कोई गम-- लता/ अमर तू मेरा चांद मैं तेरी चांदनी--श्याम सुरैया /दिल्लगी, ना मिलता गम तो बर्बादी के अफसाने कहां जाते--लता /अमर, चंदन का पलना रेशम की डोरी झूला झुलाऊं निंदिया को तोरी-- हेमंत कुमार लता /शबाब.। 
■ हेमन्त शुक्ल

Thursday, 11 June 2020

श्रद्धांजलि : खूबसूरत किरदारों की मल्लिका थीं अभिनेत्री निम्मी

श्रद्धांजलि-खूबसूरत किरदारों की मल्लिका थीं अभिनेत्री निम्मी   --------------------------------------------
■ हेमन्त शुक्ल 

‘आन’, ‘बरसात’ और ‘दीदार’ जैसी हिंदी फिल्मों में काम कर चुकीं 1950 और 60 के दशक की मशहूर अभिनेत्री निम्मी का बुधवार को लंबी बीमारी के बाद निधन हो गया। वह 88 वर्ष की थीं। यदि निम्मी के तमाम फिल्मों की अदाकारी देखी जाए अधिकांश में उसके रोल ने दर्शकों को प्रभावित किया।
उनकी ऐसी फिल्मों का नाम देखें तो बरसात, बावरा, जलते दीप, राजमुकुट, वफा, बड़ी बहू, बेदर्दी, बुजदिल, दीदार, अलिफ लैला, दर्दे दिल, मेहमान, अमर, कस्तूरी, चार पैसे, कुंदन, उड़न खटोला. बसंत बहार, राजधानी, चार दिल चार राहें, अंगुलिमाल, मेरे मेहबूब, पूजा के फूल, आकाशदीप और अंतिम फिल्म लव एंड गॉड, जिसे गुरुदत्त के निधन के बाद संजीव कुमार को लेकर फिल्म पूरी की गयी थी और निम्मी की आखिरी फिल्म साबित हुई।

फरवरी 1978 की बात है। तब मैं मुंबई में बहुचर्चित फिल्म मैगजीन बाइस्कोप में कार्यरत था और उस दौरान दो-तीन बार उनसे मुलाकात हुई थी जिनमें उन्होंने अपने बारे में कई ऐसी बातें बताई थीं जो अमूमन सब लोग नहीं जान पाए थे। बायस्कोप के अगले अंक में इन्हीं बातचीत के आधार पर उनकी “आत्मस्वीकृति” भी प्रकाशित हुई थी।
उनसे मुलाकात ऐसे हुई थी कि गोरखपुर निवासी फिल्मी दुनिया के मशहूर लेखक कवि और निर्देशक बृजेंद्र गौड़ ने एक दिन मुझे निर्माता रघुनंदन की फिल्म “चंबल की रानी” के गीत रिकॉर्डिंग के अवसर पर बुलाया। मजरूह जी के लिखे गीत को नौशाद साहब संगीत दे रहे थे और लता जी वह गाना गा रही थीं। रिकॉर्डिंग के बाद गौड़ साहब ने मुझसे कहा चलो आज निम्मी के यहां चलते हैं और उनकी आपबीती सुन के कुछ प्रकाशित कर सको तो अच्छा रहेगा। मैंने हां कर दी और निम्मी के घर हम दोनों पहुंच गए।
बृजेंद्र गौड़ जी हमारे पूर्वांचल के गोरखपुर जिले के निवासी थे और मेरा उनके यहां आना-जान अक्सर हुआ करता था। गौड़ जी ने बहुत पहले एक फिल्म कस्तूरी बनायी थी जिसकी हीरोइन निम्मी थी। खैर वहां लंबी बातचीत हुई जिसमें कस्तूरी की महक की तरह खुलकर आया कि उनका असली नाम नवाब बानो था। उनका जन्म उत्तर प्रदेश के आगरा जनपद के पास 24 मील पर एक कस्बा फतहबाद में नाना के घर हुआ था। विभाजन की त्रासदी के दौरान वहां से बम्बई अपनी नानी के पास नवाब बानो पहुंच गई।
उनकी नानी का सम्बन्ध कई फिल्मी लोगों से था। उनके पिता अब्दुल हकीम और मां वहीदन बानो भी कलकत्ते में फिल्म निर्माता ए.आर. कारदार के पड़ोसी थे तथा उनकी कई फिल्मों में छोटे-छोटे रोल कर चुके थे और अब बम्बई में रहने लगे थे। नानी अम्मा के बुजुर्गों से महबूब साहब के अच्छे ताल्लुकात भी थे। उन्हीं के जरिए ताड़देव में रहने की जगह मिल गयी।
सामने की सड़क के उस पार सेंट्रल स्टूडियो था, जहां एक दिन महबूब साहब अपनी फिल्म अन्दाज़ की शूटिंग कर रहे थे, जिसमें दिलीप कुमार, राजकपूर व नर्गिस पर सीन फिल्मा रहे थे और वह नानी के साथ सेट पर पहुंच गयीं, जहाँ कुछ देर बाद राजकपूर ने उन्हें देखकर पूछा कि ऐ लड़की तुम्हारा नाम क्या है तो उन्होंने नूर बानो बताया।
तभी राज साहब ने जाकर महबूब साहब को बताया कि उन्हें अपनी फिल्म बरसात की दूसरी हीरोइन मिल गयी। दो दिन बाद स्क्रीन टेस्ट हुआ और वह पास घोषित होकर बरसात की शूटिंग करने लगीं। वह नूर बानो से निम्मी बन गयीं। उन्होंने स्पष्ट करते हुए बताया- “यह निम्मी नाम फिल्म निर्माता राजकपूर ने दिया था, जिन्होंने अपनी पिछली फिल्म “आग” की तीनों हिरोइनों का नाम निम्मी ही रखा था और फिल्म कामयाब ही नहीं प्रशंसित भी हुई थी।”
पुराने फिल्म शौकीन अच्छी तरह जानते हैं कि साल 1949 में राजकपूर ने निम्मी को अपनी फिल्म बरसात में सेकेंड लीड के बतौर कास्ट किया था और उन पर फिल्माए फिल्म के तीन गाने “बरसात में हमसे मिले तुम…, हवा में उड़ता जाए… और मेरी पतली कमर…” काफी प्रसिद्ध हुए।
बरसात फिल्म की सफलता के बाद निम्मी ने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा. अपने ज़माने में वह हीरोइन के बाद दूसरा सबसे प्रसिद्ध किरदार करने के लिए जानी जाती थीं। बदकिस्मत प्रेमिका और गांव की खूबसूरत युवती के किरदारों के जरिए उन्होंने खुद को बॉलीवुड में स्थापित किया था।
अपने जमाने में उनकी प्रसिद्धि इतनी थी कि फिल्म आन के डिस्ट्रिब्यूटर ने उनको लेकर एक सीन अलग से जुड़वाया था, क्योंकि उन्हें लगा कि फिल्म में निम्मी के किरदार की जल्दी मौत हो जाती है। निम्मी ने अपने जमाने के शीर्ष अभिनेताओं के साथ काम किया था और अपनी अदायगी के लिए मशहूर थीं लेकिन फिल्म लेखक और निर्देशक एस. अलीरजा से शादी करने के लिए उन्होंने फिल्मों से अलविदा कह दिया था।
अपनी शादी का जिक्र करते हुए उन्होंने बताया था कि अपनी एक ही फिल्म से सफलता की चोटी पर पहुंच जाने वाली मैं हीरो के बारे में या प्रोडूसर या डायरेक्टर की यूनिट के बारे में कभी कोई पूछताछ नहीं करती थी और हर स्टार को उसी की तरह का ही पार्टनर चाहिए था। वह मुझे उस समय मालूम पड़ा जब दिलीप साहब ने “बुजदिल” में मेरे साथ काम करने से मना कर दिया।
वे यह कहते थे कि निम्मी अभी बहुत छोटी है और सुपरस्टार भी नहीं, मगर महबूब साहब ने फिल्म में काम करने के लिए मुझे तैयार किया और फिल्म हिट हो जाने पर तो हम दोनों की जोड़ी काफी हिट रही। हमने “दाग, उड़न खटोला” जैसी सुपरहिट फिल्में दी। इसके अलावा बहुत साल फिल्मों में सभी प्रकार के कलाकारों के साथ करने काम करने के बावजूद मेरा कोई स्कैंडल नहीं उड़ा।
मुझे एक बात का कभी अनुभव नहीं रहा, जो करीब-करीब हर पत्रकार पूछता और मुझे वही घिसा-पिटा उत्तर उन्हें देना पड़ता था— “पता नहीं भाई मुझे किसी ने क्यों नहीं पसंद किया, वरना मैंने काम तो सबके साथ किया।” इसी बात को आगे बढ़ाते हुए निम्मी ने बताया “एक बार मैं फिल्म आंधियां में शूटिंग कर रही थी, जिसमें नायक थे देवानंद।
देवानंद उस जमाने के रोमांटिक हीरो के रूप में प्रसिद्ध थे। फिल्म आंधियां में मेरे साथ की दूसरी नायिका थी कल्पना कार्तिक। शूटिंग चलती रही और जब समाप्त हुई तब कल्पना और देवानंद एक दूसरे के हो चुके थे। उस वक्त अन्य लोगों की तरह मैं यही कहती थी कि देव साहब एक रोमांटिक हीरो थे, क्योंकि मेरे साथ कुछ ऐसा अनुभव नहीं था।”
उन्होंने आगे जोड़ा था कि– हां यदि कोई अनुभव है तो सिर्फ एक आदमी का और वह आदमी प्रसिद्ध लेखक अली रजा थे, जो मदर इंडिया जैसी फिल्म की एक घटना के बाद उनकी बात बन गई थी। वह बताती गईं– “फिल्म मदर इंडिया के लिए महबूब साहब ने मेरे पास ऑफर भेजा था। मैंने उस फिल्म में काम करने से मना कर दिया, क्योंकि तब तक मुझे मालूम हो गया था कि मैं भी सुपरस्टार हो गई थी। दिलीप साहब की तरह !… और मदर इंडिया में कुमकुम वाला रोल मेरा था, जिसका ज्यादा महत्व नहीं था।
जब मैंने महबूब साहब को फिल्म मदर इंडिया में काम करने के लिए मना कर दिया तब डायरेक्शन विभाग के एक महाशय भी ग्रुप छोड़ कर चले गए थे। एक दिन रास्ते में मिलने पर जब मैंने उसे पूछा आपने महबूब साहब की यूनिट क्यों छोड़ दी। तब उन्होंने बड़े ही नजाकत से बालों पर हाथ फेरते हुए कहा जबसे आपने महबूब साहब का ग्रुप छोड़ा तबसे मेरा भी दिल वहां नहीं लगता था और यही साथी थे प्रसिद्ध फिल्मी लेखक अली रजा, जिन्हें पति के रूप में मैंने स्वीकार कर लिया, जो आज भी मेरी जिंदगी के खेवनहार हैं।”
आज जब निम्मी के बारे में श्रद्धांजलि स्वरूप लिख रहा हूँ तो बता दूं कि अली रजा साहब ने निम्मी का साथ 2007 तक निभाया, जब उन्हींका जनाजा उठ गया। अंत में दोनों को एक साथ श्रद्धांजलि देना जरूरी समझता हूँ।
■ हेमन्त शुक्ल 

Tuesday, 9 June 2020

भावुक व संवेदनशील अभिनेत्री थीं नरगिस

लो आ गयी उनकी याद : भावुक व संवेदनशील अभिनेत्री थीं नरगिस (जन्मदिन- 1जून : पुण्यतिथि- 3 मई)          -----------------------------------------                                     
आज के हिन्दी फिल्म दर्शक संजय दत्त और उनके पिता सुनील दत्त के नाम से परिचित तो हैं ही उनकी माँ नरगिस दत्त के बारे में भी जरूर सुने होंगे, लेकिन पुरानी फिल्मों के शौकीन दर्शकों को भलीभांति उनकी फिल्मों की याद होगी। उत्कृष्ट अभिनय कला तथा सौंदर्य की प्रतिमूर्ति नरगिस का जन्म कोलकाता में 1 जून, 1929 को हुआ था। फिल्मों में उनकी  अनूठी अभिनय क्षमता, उनकी समाजसेवा और अपने देश के लिए किये गए तमाम महत्वपूर्ण कार्यों की याद आज भी ताजा है। फिल्म उद्योग अगर किसी अभिनेत्री और इस ऐतिहासिक क्षेत्र में उनके कार्यों पर गर्व कर सकता है तो वह अभिनेत्री निश्चित ही नरगिस दत्त हैं। 
एक विचारक और समाजसेवी के तौर पर नरगिस ने उतना ही सम्मान अर्जित किया जितना एक अभिनेत्री के तौर पर उनकी मां जद्दनबाई, जो खुद एक बहुत ही कुशल अभिनेत्री निर्माता-निर्देशक रह चुकी हैं, ने नरगिस को ईमानदारी के गुण सिखाए। नरगिस कहा करती थीं- "यदि मैंने जिंदगी की यूनिवर्सिटी से कुछ सीखा है तो उसका श्रेय मेरी मां को ही जाता है"। वक्त के साथ-साथ वे एक अभिनेत्री के सभी गुणों को सीखकर इतनी होशियार हो गईं कि किसी भी विषय पर वह आत्मविश्वास के साथ तर्क दे देती थीं। यह सच है कि आरके यूनिट में आने के बाद उनकी प्रतिभा को निखारने में राज कपूर का बड़ा हाथ रहा। राज कपूर के आरके बैनर को स्थापित करने में नरगिस ने बराबर का सहयोग दिया और कड़ी मेहनत की। वैसे वह राज कपूर की मात्र नायिका ही नहीं बल्कि प्रेमिका व उनकी एक प्रेरणास्रोत भी रहीं। समाज सेवा के क्षेत्र में भी नरगिस हमेशा सम्माननीय बनी रहीं। तत्कालीन प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी से उनके बहुत ही दोस्ताना रिश्ते थे। राज्यसभा में नरगिस का नामांकन गांधी परिवार में उनकी प्रतिष्ठा का प्रमाण बन गया था। सुनील दत्त और नरगिस फिल्म जगत की ऐसी जोड़ी थी जिसने देश की सीमाओं पर जाकर सैनिकों के कल्याण कार्यक्रमों में गहरी दिलचस्पी दिखाई। यही नहीं, पाकिस्तान से लड़ाई के वक्त अजंता आर्ट का ग्रुप सीमा पर जवानों का उत्साह बढ़ाने जा पहुंचा था। फिल्म पत्रकारिता की प्रमुख स्तंभ और कई फिल्मी पत्रिकाओं की संपादक रहीं  उदयतारा नायर कहा करती थीं कि नरगिस और उसके करियर पर नजर डालें तो पता चलता है कि अभिनेत्री के रूप में उनकी क्षमता अपूर्व थी और उनकी भूमिकाएं अतिसंवेदनशील थीं जिनकी सहायता से किसी भी क्षेत्र में ढाला जा सकता था। उन्होंने जोर देकर कहा था कि अभी तक यह एक चुनौती बनी हुई है। हिंदी फिल्मों की कोई भी अभिनेत्री ऐसा रोल नहीं कर पायी जैसा नरगिस ने मदर इंडिया में किया था।
 यह रोल अभिनेत्री नरगिस की अभिनय क्षमता का शिखर था। यह सही भी है कि नरगिस का एक अंदाज कभी नहीं बना, जबकि उस समय की अभिनेत्रियां अपने एक ही अंदाज में कई-कई फिल्में किया करती थीं। "चोरी-चोरी" में वह बेहद शौकीन लगीं तो "लाजवंती" में जिस कदर ममतामयी अभिनय किया था अभी तक के आयाम खुद ब खुद टूटते चले गए। मिसाल बन जाने वाला "मदर इंडिया" का किरदार भी तो उन्हीं के हिस्से आया जिसे उन्होंने इतने मन से जीया कि उसने नरगिस की याद को न तो कभी मरने दिया और ना कभी मरने देगा। यह तो उनकी मां जद्दनबाई की देन कहा जा सकता है। जद्दनबाई तो एक नाचने गाने वाली कलावंती थी मगर उन्होंने अपनी बेटी नरगिस को नाच-गाने की तालीम नहीं दिलायी। नरगिस को एक बेहतरीन अभिनेत्री बनाने के लिए उनकी पारखी निगाह क्रियाशील रही थी। उन्होंने नरगिस को मुंबई के क्वीन मैरी हाई स्कूल में दाखिल कराया था, जहां से उसने सीनियर कैंब्रिज किया। जद्दन बाई ठीक से जानती थीं और कहा भी करती थीं कि नरगिस के नक्श सामान्य और शक्ल-सूरत साधारण ही हैं। उनके गले में गान विद्या के सुरीले सुर को जन्म लेना भी संभव नहीं है इसीलिए उनकी पारखी निगाहें यह भी दूर तक देख रही थीं कि इसके भीतर एक ऐसी प्रतिभा अवश्य सोई पड़ी है जिसे ठीक से विकसित किया जाए तो एक ऐसा आकर्षण और दिलकशी उत्पन्न की जा सकती है जो भविष्य में उसे अभिनय कला का जगमगाता चंद्रमा बना देगी। इसीलिए उन्होंने अपनी पहली फिल्म निर्माण संस्था की पहली फिल्म "तलाश-ए-हक" के दौरान नरगिस को सिर्फ 4 साल की उम्र में ले जाना शुरू कर दिया था। 
 मेरे मुंबई प्रवास के दौरान फिल्मी दुनिया के बहुत बड़े प्रचारक और पत्रकार राम औरंगाबादकर से अक्सर इस परिवार के बारे में बातचीत हुआ करती थी, जिन्होंने जद्दनबाई की एक आत्मकथा सीरीज तब के एक प्रमुख समाचार पत्र में शुरू की थी। उन्होंने बताया था-  "नरगिस का असली नाम कनीज फातिमा राशिद था। जद्दनबाई के गीत संगीत और फिल्मों में रुचि के कारण घर में फिल्मकारों का आना जाना लगा रहता था। 1942 में फिल्मकार महबूब फिल्म तकदीर बना रहे थे जिसमें उन्होंने जद्दनबाई की बेटी बेबी रानी को लिया, जो कल की बाल कलाकार रह चुकी थी और अब वह 14 साल की थी। महबूब ने ही उसको फिल्मी नाम दिया था नरगिस। उसे चमकाने में उन्होंने वाकई मेहनत की। मोतीलाल जैसे प्रतिभाशाली कलाकार के साथ उसे हीरोइन बना देना, वह भी पहली फिल्म में मामूली बात नहीं थी। रॉक्सी टॉकीज में जब 1943 में फिल्म रिलीज हुई तो कल की बेबी रानी भी अपनी मां के साथ  फ्रॉक पहने हुए फिल्म देखने गयी थी। वहां जाते समय वह फातिमा बेबी रानी थी। फिल्म देख कर बाहर निकली तो नरगिस नाम का शोर मच गया। इसके बाद तो नर्गिस ने पीछे मुड़कर नहीं देखा"।  सही भी है कि एक के बाद एक महबूब खान की कई फिल्मों में उन्होंने काम किया, जिन्होंने उन्हें स्थापित अभिनेत्रियों में शुमार कर दिया। इसी दौरान नरगिस को राज कपूर के साथ फ़िल्मी परदे पर काफी पसंद किया गया।  
लगभग 15 फिल्मों में दोनों ने  साथ काम किया।  1956 में आयी फिल्म 'चोरी चोरी' नरगिस और राजकपूर की जोड़ी वाली अंतिम फिल्म थी। कहा जाता है कि असल जिंदगी में भी नरगिस और  राजकपूर की अच्छी केमेस्ट्री थी।1957 में महबूब खान की फिल्म 'मदर इंडिया' में नरगिस सुनील दत्त की मां की भूमिका में थी।  मदर इंडिया की शूटिंग के दौरान सुनील दत्त ने नरगिस को आग से बचाया था। इस घटना के बाद नरगिस ने कहा था कि पुरानी नरगिस की मौत हो गयी है और नयी नरगिस का जन्म हुआ है। नरगिस ने उसी दिन से सुनील दत्त को अपना जीवन साथी चुन लिया।  शादी के बाद नरगिस ने फिल्मों में काम करना कम कर दिया। करीब दस साल के बाद अपने भाई अनवर हुसैन और अख्तर हुसैन के कहने पर नरगिस ने 1967 में फिल्म 'रात और दिन' में काम किया। 
इस फिल्म के लिए उन्हें राष्ट्रीय पुरस्कार से सम्मानित किया गया। यह पहला मौका था जब किसी अभिनेत्री को राष्ट्रीय पुरस्कार दिया गया। नरगिस को अपने सिने करियर में मान सम्मान बहुत मिला। वह पहली अभिनेत्री थीं जिन्हें पद्मश्री पुरस्कार मिला और वह राज्यसभा सदस्य बनीं। 
नरगिस एक अभिनेत्री से ज्यादा एक समाज सेविका रही हैं। उन्होंने नेत्रहीन और विशेष बच्चों के लिए काम किया था। वह भारत की पहली स्पास्टिक्स सोसाइटी की पेट्रन बनी थीं। उन्होंने अजंता कला सांस्कृतिक दल बनाया जिसमें तब के नामी कलाकार-गायक सरहदों पर जा कर तैनात सैनिकों का हौसला बढ़ाते थे, उनका मनोरंजन करते थे। बांग्लादेश बनने के बाद 1971 में उनका दल पहला था जिसने वहां कार्य किया था।
 मुंबई में बांद्रा में उनके नाम पर सड़क है। हर साल हो रहे राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कारों में राष्ट्रीय एकता पर बनी सर्वश्रेष्ठ फिल्म को नरगिस दत्त अवॉर्ड दिया जाता है। कैंसर से जूझ रही नरगिस  03 मई, 1981 दुनिया से सदा के लिए रुखसत हो गयीं। उस साल की 3 मई तारीख इतनी मनहूस थी जिसने भारतीय फिल्म जगत की एक संवेदनशील भावुक अभिनेत्री नरगिस को हमसे छीन लिया था। मुंबई के उस ब्रीच कैंडी हॉस्पिटल से जहाँ उनका निधन हुआ था, अपने चाहने वालों को रोता छोड़ कर अनन्त यात्रा पर चल दी थीं।  जब यह 3 मई आती है तो उनकी याद फिल्मों में उनकी अनोखी अभिनय क्षमता, उनकी समाज सेवा और अपने देश के लिए किये गए तमाम महत्वपूर्ण कार्यों की याद दिला जाती है।                               ■ हेमन्त शुक्ल                      ------------------------------------------
(बाक्स मैटर)
      नरगिस की उल्लेखनीय फिल्में
मदर इंडिया, अंदाज़, अनहोनी, जोगन, आवारा, रात और दिन, अदालत, घर संसार, लाजवंती, परदेशी, चोरी चोरी, जागते रहो, श्री 420, अंगारे, आह, धून, पापी, शिकस्त, अम्बर, अनहोनी, आशियाना, बेवफा, शीशा, दीदार, हलचल, प्यार की बातें, सागर, आधी रात, बाबुल। 

Saturday, 6 June 2020

अपने मधुर गीतों के लिए याद आते हैं राजेन्द्र कृष्ण

                                                                   (जन्मदिन 6 जून पर विशेष) 


  ----------------------------------------  अपने मधुर गीतों के लिए याद आते हैं राजेन्द्र कृष्ण            -------------------------------------- 




इन दिनों तमाम रियलिटी शोज में फिर देखा जा रहा है कि पुराने फिल्मी गीतों के गाने वालों की संख्या  बढ़ गयी है। आज युवा वर्ग  भी  अपनी  अंताक्षरी बैठकी  में   पुराने लोकप्रिय गीतों  का  इस्तेमाल करते हैं  और  महफिल को  झूमने पर विवश कर देते हैं तथा उन मधुर गीतों के रचनाकारों की बरबस याद करा जाते हैं। सही भी है कि  50 के दशक में  जितने फिल्मी गीतकार थे उनमें  वरिष्ठ गीतकार  राजेन्द्र कृष्ण का नाम प्रमुखता से उभर कर आता है, जिनका आज जन्मदिन है और ऐसे प्रतिभावान रचयिता को याद करके हम अपने प्रति ऋण को उतार सकते हैं। इसमें कोई दो राय नहीं कि  इनके हिस्से में  इतनी अच्छी- अच्छी  फिल्मों के  गीत  आए कि  उनको  भुलाया नहीं जा सकता। अभी पिछले 23 सितंबर को  उनकी पुण्यतिथि  पर  कई रेडियो वार्ताओं में मुझे उनपर चर्चा करनी पड़ी,  जिनका  सारांश यहां प्रस्तुत  है।                   

  राजेन्द्र कृष्ण दुग्गल का जन्म जलालपुर जट्टान में एक दुग्गलपरिवार में 6 जून 1919 को, गुजरात जिले (वर्तमान पाकिस्तान में) में हुआ था। उनके बताए अनुसार जब वे आठवीं कक्षा में पढ़ रहे थे तब भी वे कविता की ओर आकर्षित थे। अपने प्रारंभिक कार्य जीवन में उन्होंने शिमला में नगरपालिका कार्यालय में एक क्लर्क की नौकरी की, जहांं वह 1942 तक कार्यरत रहे। उस अवधि के दौरान, उन्होंने पूर्वी और पश्चिमी लेखकों को बड़े पैमाने पर पढ़ा और कविता लिखी। उन्होंने फिराक गोरखपुरी और अहसान दानिश की उर्दू शायरी के साथ-साथ पंत और निराला की हिंदी कविताओं के प्रति अपनी कृतज्ञता व्यक्त की। उन दिनों दिल्ली-पंजाब के अखबारों ने विशेष परिशिष्ट निकाले और काव्य गोष्ठी में कृष्ण जन्माष्टमी को चिह्नित किया, जिसमें उन्होंने नियमित रूप से भाग लिया।


1940 के दशक के मध्य में वह हिंदी फिल्म उद्योग में एक पटकथा लेखक बनने के लिए बॉम्बे (अब मुंबई) में स्थानांतरित हो गए। उनकी लिखी पहली पटकथा फिल्म जनता (1947) की थी। गीतकार के रूप में उनकी पहली फिल्म जंजीर (1947) थी। उन्हें मोतीलाल - सुरैया स्टारर आज की रात (1948) की पटकथा और गीत के लिए पहली बार जाना गया था। महात्मा गांधी की हत्या के बाद, उन्होंने एक गीत "सुनो- सुनो ऐ दुनियावालों, बापू की ये अमर कहानी" लिखा। यह गीत मोहम्मद रफ़ी द्वारा गाया गया था और हुस्नलाल भगतराम द्वारा संगीतबद्ध किया गया था। यह गीत आज भी उतना ही लोकप्रिय है। उन्होंने बतौर गीतकार बड़ी बहन (1949) और लाहौर(1949) के साथ सफलता का स्वाद चखा।

राजेन्द्र कृष्ण संगीतकार सी. रामचंद्र के साथ अपने जुड़ाव के लिए भी जाने जाते हैं। उन्होंने शंकर-जयकिशन , रवि , राजेश रोशन , मदन मोहन , हेमन्त कुमार , सज्जाद हुसैन , सचिन देव बर्मन , राहुल देव बर्मन , एस. मोहिंदर, चित्रगुप्त , सलिल चौधरी , और लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल सहित कई अन्य संगीत निर्देशकों के साथ काम किया तथा एक से एक मधुर गीतों की रचना की।

23 सितंबर 1987 को मुंबई में उनका निधन हो गया। उनकी मृत्यु के बाद, एचएमवी ने एक एलपी निकाला जिसमें उनके 12 सुमधुर व लोकप्रिय गाने थे।        *राजेन्द्र कृष्ण* रचित फिल्मों के मधुर गीत :

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 *आजाद* = कितना हसीन है मौसम.... लता-चितलकर



 *यह रास्ते हैं प्यार के* = ये खामोशियां ये तन्हाईयां.... रफ़ी-आशा

 *भाई भाई* = मेरा नाम अब्दुल रहमान.... किशोर-लता
 *ताज*= बांसुरिया फिर से बजाओ कान्हा.... हेमंत-लता

 *अलबेला*= दीवाना परवाना शमा पर लेकर आया.... लता-चितलकर



 *आशियाना*= ओ मैडम ओ मिस्टर होते होते हो गए एक हम.... किशोर-शमशाद 

 *प्यार की जीत*= ओ दूर जाने वाले वादा ना भूल जाना....सुरैया

 *बहार*= कुसूर आपका हुजूर आपका मेरा नाम लीजिए न मेरे बाप का.... किशोर

 *बारिश*= कहते हैं प्यार किसको पंछी जरा बता दे.... सी.रामचंद्र-लता

 *सच्चाई*= 100 बरस की जिंदगी से अच्छे हैं प्यार के दो चार दिन.... रफ़ी-आशा

 *जेलर*= हम प्यार में जलने वालों को चैन कहां आराम कहां.... लता

 *पतंग*= तेरी शोख नजर का इशारा.... मुकेश-लता : चित्रगुप्त

 *बहार*= दुनिया का मजा ले लो दुनिया तुम्हारी है.... शमशाद : एसडी बर्मन

 *दुनिया झुकती है*= फूलों से दोस्ती है कांटों से यारी है.... रफी : हेमंत कुमार

 *शर्त*= न ये चांद होगा न तारे रहेंगे.... गीता दत्त : हेमंत कुमार

 *सजा* = आ गुपचुप गुपचुप प्यार करें छुप छुप आंखें चार करें....  संध्या मुखर्जी-हेमंत कुमार

 *बड़ी बहन* चले जाना नहीं नैन मिला के हाय सैया बेदर्दी.... लता : हुसनलाल भगतराम
 *जॉनी मेरा नाम*= ओ मेरे राजा खफा ना होना.... किशोर-आशा *आजाद*= जा री जा री ओ कारी बदरिया.... लता : सी. रामचंद्र

 *नींद हमारी ख्वाब तुम्हारे*= हुस्न जब इश्क से टकरा गया.... रफ़ी- आशा

 *ब्लफ मास्टर* हुस्न चला कुछ ऐसी चाल.... लता-रफी

 *जहांआरा*= बाद मुद्दत के यह घड़ी आयी आप आए तो जिंदगी आयी... रफी-सुमन कल्याणपुर : मदन मोहन

 *अलबेला* = शोला जो भड़के दिल मेरा धड़के.... लता-चितलकर : सी. रामचंद्र

 *अनारकली*= जाग दर्दे इश्क जाग.... लता-हेमंत कुमार : सी. रामचंद्र

 *मनमौजी*= एक था अब्दुल रहमान एक थी रहमानिया.... किशोर-लता : मदन मोहन

 *संगीत सम्राट तानसेन* दिल में समा गए सजन फूल खिले चमन चमन.... लता-तलत

 *बहार*= है दुनिया का मजा ले लो दुनिया तुम्हारी है.... शमशाद : एस डी बर्मन

 *बड़ी बहन*= चले जाना नहीं नैन मिला के सैया बेदर्दी.... लता-ऊषा : हुस्नलाल भगतराम
 *आशियाना*= मैं पागल मेरा मनवा पागल.... तलत : मदन मोहन

 *बहाना*= तेरी ही निगाहों में तेरी ही बाहों में रहने को जी चाहता है....  आशा-तलत : मदन मोहन

 *दुनिया झुकती है*= गुमसुम सा यह जहां यह रात यह हवा.... गीता दत्त : हेमंत कुमार

 *बहार*= छोड़ो जी छोड़ो, छोड़ो जी कन्हैया कलैया हमार....शमशाद :  एसडी बर्मन

 *अकेला*= पास ना होवे जिनके रोटी नींद कहां से आए.... आशा भोसले

 *दो सितारे*= मुझे तुझसे मोहब्बत है.... सुरैया : अनिल विश्वास

 *नागिन*= ऊंची ऊंची दुनिया की दीवारें सैंया छोड़ के मैं आई रे.... लता : हेमंत कुमार

 *छाया*= इतना ना मुझसे तू प्यार बढ़ा कि मैं एक बादल आवारा.... लता-तलत :सलिल चौधरी

 *लव इन शिमला*= लव का मतलब है प्यार प्यार दिलों का करार.... रफ़ी-आशा

 *सगाई*= ना ये जमीं थी ना ये आसमां था.... रफ़ी-आशा : रवि

 *चंपाकली*= ओ जी ओ जी छोड़ो मेरा दुपट्टा हो जादूगर बालमा....  लता-हेमंत : हेमंत कुमार

 *जहांआरा*= तेरी आंख के आंसू पी जा ऊं ऐसी मेरी तकदीर कहां.... तलत : मदनमोहन
 *आशियाना*= मेरे पिया से जाकर कोई जाकर कोई कह दे जीवन का सहारा तेरी याद है.... लता : मदन मोहन

 *चंपाकली*= छुप गया कोई रे दूर से पुकार के.... लता : हेमंत कुमार

 *पॉकेटमार*= प्रीत है तू ही मेरा मीत है समा है यह प्यार का.... लता-तलत

 *प्यार की जीत*= तेरे नैनों ने चोरी किया मेरा छोटा सा जिया परदेसिया.... सुरैया : हुसनलाल भगतराम

 *आजाद*= अपलम चपलम चपलाई रे दुनिया को छोड़ तेरी गली आई रे.... लता-उषा

 *खानदान*= नील गगन पर उड़ते बादल आ आ आ... रफी-लता : रवि।                     

  ■ हेमन्त शुक्ल

9838689871       (hemant.sahara@gmail.com)

Thursday, 4 June 2020

★"वो जब याद आए बहुत याद आए" ★