रोमांटिक फिल्मी गीतों के पुरोधा : शकील बदायूंनी
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शकील बदायूनी मसूदी का जन्म स्थान उत्तर प्रदेश का शहर बदायूं है यह एक उर्दू के शायर और साहित्यकार तो थे ही इन्होंने बॉलीवुड में फिल्मी गीतों की रचना करके एक अलग नाम कमाया। उनके कृत्यों को देखें तो वर्ष 1961 में फिल्म चौदहवीं का चांद के गीत "चौदहवीं का चांद हो या आफताब हो" के लिए सर्वश्रेष्ठ गीतकार का फिल्मफेयर पुरस्कार दिया गया और 1962 में फिल्म घराना में गीत "हुस्न वाले तेरा जवाब नहीं" के लिए भी सर्वश्रेष्ठ गीतकार का फिल्मफेयर पुरस्कार दिया गया था। इसी तरह 1963 में फिल्म बीस साल बाद में गीत "कहीं दीप जले कहीं दिल" के लिए फिल्मफेयर के सर्वश्रेष्ठ गीतकार का पुरस्कार दिया गया था। शकील बदायूंनी का लिखा एक गीत "मन तड़पत हरिदर्शन को आज", जो कि बैजू बावरा के लिए लिखा गया था, आज भी भारत की आत्मा का प्रतीक है। इस गीत को नौशाद साहब के संगीत निर्देशन में गाया था महान गायक मोहम्मद रफी ने।
एक मशहूर शायर शकील बदायूंनी का स्मृति दिवस आज है। आज ही के दिन 1970 में शकील बदायूंनी मसऊदी साहब अपने मधुर फिल्मी गीतों के चाहनेवालों और अपनी शायरी के शौकीनों को दुखी छोड़कर इस दुनिया से दूर चले गए।
शकील बदायूनी मसूदी का जन्म स्थान उत्तर प्रदेश का शहर बदायूं है यह एक उर्दू के शायर और साहित्यकार तो थे ही इन्होंने बॉलीवुड में फिल्मी गीतों की रचना करके एक अलग नाम कमाया। उनके कृत्यों को देखें तो वर्ष 1961 में फिल्म चौदहवीं का चांद के गीत "चौदहवीं का चांद हो या आफताब हो" के लिए सर्वश्रेष्ठ गीतकार का फिल्मफेयर पुरस्कार दिया गया और 1962 में फिल्म घराना में गीत "हुस्न वाले तेरा जवाब नहीं" के लिए भी सर्वश्रेष्ठ गीतकार का फिल्मफेयर पुरस्कार दिया गया था। इसी तरह 1963 में फिल्म बीस साल बाद में गीत "कहीं दीप जले कहीं दिल" के लिए फिल्मफेयर के सर्वश्रेष्ठ गीतकार का पुरस्कार दिया गया था। शकील बदायूंनी का लिखा एक गीत "मन तड़पत हरिदर्शन को आज", जो कि बैजू बावरा के लिए लिखा गया था, आज भी भारत की आत्मा का प्रतीक है। इस गीत को नौशाद साहब के संगीत निर्देशन में गाया था महान गायक मोहम्मद रफी ने। फिल्मी गीतों के जानकार अनुराग भारद्वाज का एक संस्मरण याद आता है जिसमें उन्होंने बताया है कि "चौदहवीं का चांद" का पहला गाना रिकॉर्ड किया जाना था। गुरुदत्त जी बेचैन थे और उनसे भी ज्यादा स्टूडियो के कोने में कुर्सी पर बैठे हुए शकील बदायूंनी। संगीतकार रवि शंकर शर्मा उर्फ रवि दोनों की बेचैनी को बहुत अच्छी तरह से समझ रहे थे। दरअसल 'कागज के फूल' फ्लॉप हो चुकी थी, गुरुदत्त और बर्मन दा की जोड़ी टूट चुकी थी और उधर शकील भी पहली बार नौशाद के प्रभाव से बाहर निकल कर किसी नये संगीतकार से जुड़े थे। शकील साहब ने रवि से पूछा था-- क्यों भाई रवि सब ठीक तो रहेगा? रवि ने कहा था फिकर ना करो शकील भाई बस तुम धीरज रखो। गुरुदत्त ने दोनों की बातचीत को सुना तो घबराकर बंगाली लहजे से बोले--अरे शकील, गीत तो चलेगा ना... और भाई ना चले तो तूं बदायूं चला जा और रोबी तूं दिल्ली चला जा और मैं डूब मरूं ! रवि साहब ने उन्हें ढाढ़स बंधाते हुए हंस कर कहा -- दादा, सब ठीक होगा, आप चिन्ता मत करिए। आज भी फिल्मी गानों के शौकीन याद कर सकते हैं कि इस गीत के बाद शकील साहब का जो डंका बजा उसकी धमक आज भी है।
यह भी कहा जा सकता है कि शकील बदायूंनी फिल्मी दुनिया के ऐसे गीतकार थे जिनका कोई सानी नहीं। मोहम्मद जमाल सोख्ता कादरी के पुत्र शकील बदायूंनी का जन्म 3 अगस्त 1916 को बदायूं उत्तर प्रदेश में हुआ था। अरबी-फारसी, उर्दू और हिंदी की तालीम उनके पिता ने दिलवाई थी। शायरी का तो उन्हें बचपन से ही शौक था। उनके दूर के एक रिश्तेदार थे जो शायर थे। ...और वह थे शायर जियाउल कादरी बदायूंनी, जो दौर के हालात पर शायरी किया करते थे। इन्हीं के सुझाव से शकील साहब अपनी शायरी का संशोधन किया करते थे। 1936 में अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय में उन्होंने दाखिला लिया था और यूनिवर्सिटी के मुशायरे में शिरकत करने लगे। यूनिवर्सिटी से बी.ए. करने के बाद दिल्ली आए और सप्लाई ऑफिस में नौकरी करने लगे। उन दिनों सामाजिक सरोकार की शायरी हुआ करती थी और उस दौर में शकील बदायूंनी साहब रोमांटिक दौर की शायरी दे रहे थे। उस समय की उनकी चंद लाइनें कितनी प्रभावकारी हैं देखिए जरा-- "मैं शकील दिल का हूं तरजुमा कि मोहब्बतों का हूं रास्ता, मुझे फक्र है कि मेरी शायरी मेरी जिंदगी से जुदा नहीं"। शायरी के जरिए ही अलीगढ़ से शकील साहब तशरीफ लाते हैं तब की बम्बई। उनकी मुलाकात यहां होती है मशहूर फिल्मकार ए. आर. कारदार और महान संगीतकार नौशाद साहब से। फिर तो शकील और नौशाद साहब की जोड़ी ऐसी जमीं जो तब तक फिल्मी दुनिया पर जमीं रही जब तक दोनों का निधन नहीं हो गया, लेकिन उनके गाने,उनके संगीत आज भी हमारे जेहन में मौजूद हैं।
यह भी कहा जा सकता है कि शकील बदायूंनी फिल्मी दुनिया के ऐसे गीतकार थे जिनका कोई सानी नहीं। मोहम्मद जमाल सोख्ता कादरी के पुत्र शकील बदायूंनी का जन्म 3 अगस्त 1916 को बदायूं उत्तर प्रदेश में हुआ था। अरबी-फारसी, उर्दू और हिंदी की तालीम उनके पिता ने दिलवाई थी। शायरी का तो उन्हें बचपन से ही शौक था। उनके दूर के एक रिश्तेदार थे जो शायर थे। ...और वह थे शायर जियाउल कादरी बदायूंनी, जो दौर के हालात पर शायरी किया करते थे। इन्हीं के सुझाव से शकील साहब अपनी शायरी का संशोधन किया करते थे। 1936 में अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय में उन्होंने दाखिला लिया था और यूनिवर्सिटी के मुशायरे में शिरकत करने लगे। यूनिवर्सिटी से बी.ए. करने के बाद दिल्ली आए और सप्लाई ऑफिस में नौकरी करने लगे। उन दिनों सामाजिक सरोकार की शायरी हुआ करती थी और उस दौर में शकील बदायूंनी साहब रोमांटिक दौर की शायरी दे रहे थे। उस समय की उनकी चंद लाइनें कितनी प्रभावकारी हैं देखिए जरा-- "मैं शकील दिल का हूं तरजुमा कि मोहब्बतों का हूं रास्ता, मुझे फक्र है कि मेरी शायरी मेरी जिंदगी से जुदा नहीं"। शायरी के जरिए ही अलीगढ़ से शकील साहब तशरीफ लाते हैं तब की बम्बई। उनकी मुलाकात यहां होती है मशहूर फिल्मकार ए. आर. कारदार और महान संगीतकार नौशाद साहब से। फिर तो शकील और नौशाद साहब की जोड़ी ऐसी जमीं जो तब तक फिल्मी दुनिया पर जमीं रही जब तक दोनों का निधन नहीं हो गया, लेकिन उनके गाने,उनके संगीत आज भी हमारे जेहन में मौजूद हैं।
दोनों के पहली बार मिलने का किस्सा नौशाद साहब ने फरवरी 1978 में, जब मैं फिल्म मैगजीन बायस्कोप में सहायक सम्पादक था और उन्हीं के संगीत निर्देशन में निर्माता रघुनन्दन की बन रही फिल्म "चम्बल की रानी" की रिकॉर्डिंग के दिन उनसे बातचीत कर रहा तो बताया था- "जब पहली पहली बार मुझसे शकील साहब मिले तो मैंने उनसे दो लाइनों में अपनी कविता का मर्म सुनाने को कहा। अब उनका एक्सप्रेशन क्या था देखिए-- "हमदर्द का अफसाना दुनिया को सुना देंगे, हर दिल में मोहब्बत की इक आग लगा देंगे।" इसी गाने को नौशाद साहब ने 1947 की फिल्म "दर्द" में बड़ी ही संजीदगी और काबिलियत से पेश किया था। यह गीत जाहिर करता है उनकी रचनाशीलता का प्रमाण।
शकील साहब ने एक इंटरव्यू में बताया था कि अपने चाचा जिया उल कादरी साहब से शायरी की सलाह लिया करते थे और 1930 में चौदह साल की उम्र में पहली गजल कही। शकील साहब ने बम्बई आने की बात पर उसी साक्षात्कार में कहा था कि मैं फिल्म लाइन में आना नहीं चाहता था, क्योंकि दिल्ली में सरकारी मुलाजिम था लेकिन एक दोस्त के कहने पर बम्बई के एक मुशायरे में शिरकत की, जहां कुछ फिल्म के निर्माता निर्देशकों ने मेरी शायरी सुनी और फिल्मों में लिखने की सलाह दी।... तो मैंने सोचा कि जिंदगी के लिए कुछ काम तो करना ही है। फिर सबकी मानकर फिल्म लाइन में पहुंच गया कि यहाँ अपने मिजाज का माहौल मिल जाएगा। इसलिए मैं सरकारी नौकरी छोड़कर मुंबई आ गया और फिल्म लाइन में शामिल हो गया और पहली फिल्म दर्द के लिए पहला गाना लिखा जिसका संगीत नौशाद साहब ने दिया था। जब शकील साहब से पूछा गया अदब में लिखना और फिल्म के लिए लिखना दोनों में क्या अंतर है तब उनका जवाब था कि अदब में लिखना फ्री होता है। अपने दिमाग की चीज होती है। उसमें पाबंदियां नहीं होतीं और वह एक स्वतंत्र रचना निकलती है, लेकिन फिल्म लाइन में तमाम पाबन्दियां होती हैं। इसी बात को शकील साहब ने विविध भारती रेडियो के एक साक्षात्कार में समझाते हुए कहा था कि-- नंबर एक तो फिल्म के लिए गीत लिखने में हमें कई चीजों पर ध्यान देना पड़ता है। मसलन कलाकार कैसा है, उस समय की सिचुएशन कैसी है, जिस दृश्य में यह गीत लगाया जाएगा उसकी पृष्ठभूमि क्या होगी। इन सबका ध्यान देना पड़ता है। यानी कि कैरेक्टर यदि गमगीन है तो हमें उस कैरेक्टर के गम को महसूस करते हुए अपनी शायरी को अंजाम देना पड़ता है। यदि कैरेक्टर खुश है तो उसकी खुशी का इजहार करते हुए हमें शायरी करनी पड़ती है और नंबर दो -हमें यह भी ख्याल करना पड़ता है कि शायरी की जबान सहज व सरल हो जिसे सब समझ सकें और नंबर 3- की बात है कि हमारी फिल्मों में आमतौर पर सिचुएशन ऐसी होती है कि अधिकांश शायरों को फिल्मों में एक ही तरह के गीत लिखने की गुंजाइश दी जाती है, लेकिन हमें इस बात का ख्याल रखना पड़ता है कि हमारा कलाम सरल व सबकी समझ में आ जाए। उनका कहना यह भी था कि फिल्मों में तर्ज(लिरिक) पर गीत लिखने की भी डिमांड होती है और ऐसे में संगीत की दुनिया में लिखने वालों को तरह-तरह की वैरायटी मिलती है। उन्होंने शायर बनने के लिए क्या-क्या जरूरत होती है, पूछने पर कहा था- "शायर पैदाइशी होता है। शायरी किसी के सिखाने से नहीं आती लेकिन शायद अगर थोड़ी बहुत सलाहियत रखता है और उसको माहौल भी ऐसा ही मिल जाता है तो शायरी का पौधा आगे चलकर बहुत ही फलता-फूलता है।
यहां यह भी बताना जरूरी है कि शकील साहब की बहुत सी गैर फिल्मी गजलें हैं जिन्हें बेगम अख्तर ने अपनी आवाज दी है और बाद में पंकज उदास साहब ने भी गाया है। उनका फिल्मी सफर बहुत ही सुहाना व सफल रहा कि उन्होंने जिन 89 फिल्मों में गीत लिखे वे सभी आज मानक ही नहीं बने बल्कि अपने बाद के फिल्मी गीतकारों के लिए एक रास्ता बना गए... आज उनकी पुण्यतिथि पर जितनी भी श्रद्धांजलि दी जाए, कम ही होगी। ■ हेमन्त शुक्ल
बाक्स मैटर
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दिलवाले दिलवाले जल जल के ही मर जाना-- उमादेवी/ नाटक, संग संग रहेंगे तुम्हारे ए हुजूर चंदा से चकोर रहे भला कैसे दूर-- रफी आशा/ मुलजिम, दो हंसों का जोड़ा बिछड़ गयो रे गजब भयो रामा जुलम भयो रे-- लता गंगा जमुना, तू मेरा चांद मैं तेरी चांदनी--श्याम कुमार नूरजहां/दिल्लगी, दुख भरे दिन बीते रे भैया अब सुख भरा दिन आयो रे--शमशाद साथी/ मदर इंडिया, शाकिया आज मुझे नींद नहीं आएगी सुना है तेरी महफिल में रतजगा है-- आशा सखियां/ साहब बीवी ,और गुलाम, एक मीठी नजर फूल बरसा गई मेरी दुनिया में जैसे बाहर आ गई-- रफ़ी आशा / बेटी, मेरे सीने पर जरा हाथ रख कर तो देखो यह दिल की धड़कन नहीं प्यार की शहनाई है-- तलत वांटेड, राह में चलते चलते नैना मार गई रे-- लता रफी/ राम और श्याम, जबसे तुम्हें देखा है आंखों में तुम ही तुम हो--आशा रफी / घराना, मिलते ही आंखें दिल हुआ दीवाना किसी का अफसाना मेरा बन गया अफसाना किसी का-- तलत शमशाद /बाबुल, जोगन बन जाऊंगी सैंया तोरे कारन-- लता/ शवाब, लगन मेरे मन की बलम नहीं जाने--लता/ बाबुल, आज मेरे मन में सखी बांसुरी बजाए गाए सखी कोई छैलवा हो--लता साथी/ ऑन, ना मैं भगवान हूं ना मैं शैतान हूं दुनिया जो चाहे समझे मैं तो इंसान हूं-- रफी/ मदर इंडिया, इंसाफ की डगर पर बच्चों दिखाओ चल के यह देश है तुम्हारा नेता तुम्हीं हो कल के-- हेमंत कुमार साथी/ गंगा-जमुना, दिल लगाकर हम ये समझे जिंदगी क्या चीज है-- महेंद्र कपूर/ जिंदगी और मौत, मैं भंवरा तू है फूल ए दिल मत भूल जवानी लौट के आए ना--शमशाद मुकेश/मेला, कदर मोरे मन की बलम नहीं जाने--लता/ बाबुल, तेरे सदके बलम न करे कोई गम यह शमा यह जहां फिर कहां--लता/अमर, तेरा ख्याल दिल से भुलाया न जाएगा-- सुरैया/ दिल्लगी, अफसाना लिख रही हूं दिले बेकरार का --उमा देवी/ दर्द, आई है बहारें मिटे जुल्मो सितम--रफी साथी/राम और श्याम, एक बार जरा फिर कह दो मुझे शरमा के तुम दीवाना-- हेमंत कुमार/ बिन बादल बरसात, तू मेरा चांद मैं तेरी चांदनी--सुरैया/दिल्लगी, मान मेरा एहसान अरे नादान कि मैंने तुमसे किया है प्यार--रफी /आन, मधुबन में राधिका नाचे रे--रफी/ कोहिनूर, तेरे सदके बलम न करे कोई गम-- लता/ अमर तू मेरा चांद मैं तेरी चांदनी--श्याम सुरैया /दिल्लगी, ना मिलता गम तो बर्बादी के अफसाने कहां जाते--लता /अमर, चंदन का पलना रेशम की डोरी झूला झुलाऊं निंदिया को तोरी-- हेमंत कुमार लता /शबाब.।
■ हेमन्त शुक्ल


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